अनाज के भूसे से मशरूम तैयार करने वाली MBA की महिला

देश में कई जगह, जैसे की छत्तीसगढ़, पंजाब, ओडिशा, यूपी और बिहार सहित कई राज्यों में बड़े पैमाने पर अनाज की खेती होती है। अधिकतर किसान पराली को या तो कटाई के बाद जला देते हैं या फिर उसे खेत में छोड़ देते हैं। इससे न केवल खेत बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान होता है।
लेकिन ओडिशा के बरगढ़ जिले की रहने वाली जयंती प्रधान ने इस समस्या के समाधान के लिए पहल की है। इसका उपयोग मशरूम की खेती और बेकार भूसे से वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने के लिए किया जाता है। इससे वह हर साल 20 लाख रुपये कमा रही हैं।
जयंती कहती है कि हमारे इलाके में ज्यादातर लोग अनाज की खेती करते हैं। यह ज्यादा पैसा नहीं बनाता है। इसलिए मैंने फैसला किया कि मुझे वास्तव में जो करना है वह यह सीखना है कि इसे सही तरीके से कैसे किया जाए। जो दूसरे लोगों को भी रोजगार से जोड़ सकता है।
और आगे बताती हैं कि, भूसे की बड़ी समस्या है। किसान इसे लेने से परेशान है, यह उसके लिए बेकार की बात है। वे इसे कहीं फेंक देते हैं या जला देते हैं। मैंने थोड़ी खोजबीन की और महसूस किया कि इस भूसे का उपयोग उन क्यारियों में किया जा सकता है जो मशरूम की खेती के लिए तैयार की जाती हैं। फिर 2003 में मैंने पास के एक कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लिया और धान की पुआल मशरूम उगाना शुरू किया।
38 वर्षीय एमबीए ग्रेजुएट हैं। वे कहते हैं कि मैं एक किसान परिवार से आता हूं। मेरे पिता चाहते थे कि मैं उनके लिए कुछ करूं। इसलिए मैंने एमबीए की डिग्री भी ली, लेकिन मैं कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने के बजाय खेती में करियर बनाना चाहता था। इसलिए कभी नौकरी के लिए प्रयास नहीं किया।।

जयंती ने स्थानीय महिलाओं का एक समूह बनाया है। इससे 100 से ज्यादा महिलाएं जुड़ चुकी हैं। जयंती उन्हें धान की पुआल मशरूम की खेती और प्रसंस्करण का प्रशिक्षण देती है। ये महिलाएं उत्पाद को तैयार कर जयंती तक पहुंचाती हैं। इसके बाद जयंती इसे बाजार में सप्लाई करती है। ये महिलाएं प्रति माह 200 क्विंटल से अधिक मशरूम का उत्पादन करती हैं। उन्होंने 35 लोगों को भी रोजगार दिया है जो जयंती की खेती और उत्पादों के प्रसंस्करण में मदद करते हैं। वर्तमान में वे मशरूम से प्रसंस्करण करके अचार और पापड़ जैसे दर्जन भर उत्पाद तैयार करते हैं और उन्हें स्थानीय बाजार में भेजते हैं।

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