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किसानों का है एक ही नारा है ‘चलो दिल्ली’

3 कृषि कानूनों पर किसानों का आंदोलन जारी है

28 Nov. Vadodara: ‘चलो दिल्ली’ के नारे के साथ किसानों ने कृषि कानून के विरोध में दिल्ली कूच करने का जो उद्देश्य रखा था, उसे आंदोलन के दूसरे ही दिन पूर्ण करने में किसान सफल रहे। दिल्ली की सीमा तक पहुंचने के लिए इन किसानों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा है जिसमें उन्हें आठ बड़े बैरिकेड को पार कर आगे बढ़े और यही नहीं बल्कि जगह-जगह सुरक्षाबलों की घेराबंदियों को तोड़ते हुए आगे बढ़ना पड़ा। लेकिन ये सब कुछ इतने योजनाबद्ध तरीके से किया गया कि प्रशासन की किसानों को रोकने की हर कोशिश विफल साबित हुई।

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image Credit: Dainik Bhaskar

आंदोलन और स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार ही देखा गया है जब प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए खुद प्रशासन ने ही सड़कें खोद डाली हों। अमूमन आंदोलन कर रहे लोगों पर सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगते हैं, लेकिन यहाँ बाज़ी पलट गयी है क्यूंकि इस आंदोलन में यह आरोप खुद सरकार पर ही लग रहे हैं। पंजाब और हरियाणा से चले किसान ये जानते थे कि प्रशासन उन्हें रोकने की जो बन पड़ेगा वो करेगा। लिहाजा उन्होंने इससे निपटने की तैयारी पहले से ही कर ली थी। किसानों के जत्थों में ऐसे युवा शामिल थे जो ट्रैक्टर प्रतियोगिताओं के विजेता रहे हैं और कई तरह के स्टंट ट्रैक्टर करते रहे हैं। इन युवाओं के लिए भारी से भारी बैरिकेड को ट्रैक्टर की मदद से साफ कर देना बाएं हाथ का ही खेल था।

स्थानीय लोगों से लगातार इनपुट लेते रहना भी किसानों की रणनीति का बेहद ही अहम हिस्सा रहा। जहां भी प्रशासन ने हाईवे को बड़े बैरिकेड और सुरक्षाबलों की तैनाती से ब्लॉक किया था, उन जगहों को स्थानीय किसानों की मदद से प्रदर्शनकारियों ने बाइपास किया और हाइवे से सटे खेतों से होते हुए किसानों के जत्थे आगे बढ़ गए। समालखा के पास तो संत निरंकारी आश्रम ने अपने खेतों को किसानों के लिए खोल दिया, जहां से बड़ी तादाद में किसानों का जत्था हाईवे को बाइपास करते हुए आगे बढ़ गया।

इस पूरे रास्ते में पुलिस ने किसानों को रोकने की हर संभव कोशिशें की। कई जगह स्थानीय पुलिस ने किसानों पर वॉटर केनन भी चलाई, लेकिन इसके बाद भी किसानों के आगे बढ़ने से नहीं रोक सके। आगे बढ़ने के लिए जितनी भी चीजें जरूरी हैं, वे सभी चीजें किसान अपने साथ ही लेकर चलते दिखे। मसलन किसानों के साथ सिर्फ बैरिकेड तोड़ने के लिए विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि कई मैकेनिक भी शामिल रहे ताकि किसी भी गाड़ी के खराब होने की स्थिति में उसे तुरंत ही ठीक किया जा सके। इतना ही नहीं, आंदोलनकारी किसानों के जत्थों में डॉक्टर तक शामिल रहे जो मेडिकल इमरजेंसी के समय पर हालात को संभाल सकें।

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आम आदमी पार्टी से रहे सांसद डॉक्टर धर्मवीर भर्ती भी किसानों के इस जत्थे में शामिल रहे जो बीते दो दिनों से प्रदर्शनकारी किसानों को मुफ्त मेडिकल सलाह भी दे रहे हैं।

आंदोलन के दूसरे की शाम तक सैकड़ों ट्रैक्टर और किसानों की अन्य गाड़ियां दिल्ली के सिंघु बॉर्डर तक पहुंच चुकी थीं। यहां पहुंचने के बाद सुरक्षाबलों और किसानों के बीच तीन-चार बार टकराव हुआ जिसमें पुलिस की तरफ से वॉटर केनन और आँसू गैस के गोले दागे गए थे और फिर दोनों तरफ से पत्थर भी फेंके गए जिसके चलते कुछ किसानों को चोट भी आई। लेकिन यह स्थिति जल्द ही नियंत्रण में आ गई और फिर किसान सिंघु सीमा पर ही लंगर डालकर बैठ गए।

हालांकि इस वक्त तक किसानों को दिल्ली में दाखिल होने की हरी झंडी दे दी गई थी लेकिन अब किसानों ने दिल्ली में दाखिल होने की जगह हाइवे पर ही ठहरे रहने का विकल्प चुना। किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी दैनिक भास्कर को बताते हैं कि, ‘पंजाब के किसान भाई नहीं चाहते कि हम लोग दिल्ली में जाकर किसी कोने में क़ैद कर दिए जाएं लिहाजा यहीं रुक जाने का फैसला लिया गया। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि पहले तो सरकार ने हमें रोकने के लिए सड़कें तक खोद डाली ताकि हम दिल्ली न पहुंच सकें। जब हम दिल्ली पहुंच गए तो अब अनुमति देने का क्या मतलब है। अब हम भी अपने तरीकों से काम करेंगे। हम यहां दिल्ली में घिर जाने के लिए नहीं बल्कि दिल्ली को घेरने के लिए पहुंचे हैं।’किसानों का ‘चलो दिल्ली’ आंदोलन क्या दिल्ली पहुंचने के साथ ही सफल मान लिया जाए?

इस सवाल के जवाब में गुरनाम सिंह चढूनी कहते हैं, ‘नारा दिल्ली पहुंचने का था और हम पहुंच भी गए जबकि सरकार ने हमें रोकने के लिए पूरा जोर लगा दिया था। इस नजरिए से देखें तो आंदोलन सफल ही रहा है। लेकिन इस आंदोलन की असली सफलता तो तब है जब ये कॉर्पोरेट के हितों के लिए बनाए गए काले कानून रद्द हों। हम उसी उद्देश्य से यहां आए हैं और सरकार ध्यान रखे कि हम इससे पहले लौटने के लिए तो बिलकुल नहीं आए हैं।’

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